Friday, October 2, 2020

कहा से आए हम

-कहाँ से कहाँ आ गए हम

हाथरस के घटना क्रम को देखा जाए तो यह भ्रम टूट जाता है कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है। जिनते सुरक्षा कर्मी वहाँ पहरा दे रहे हैं, इतना पहरा तो आंतकवादियों के लिए भी नहीं होता । यह भी प्रश्न चिह्न रहा है विगत कुछ वर्षों से कि विपक्ष कुछ नहीं कह रहा, न कुछ कर रहा है। सच तो यह दिख रहा है कि विपक्ष को छुपाया जा रहा है। विपक्ष अपना कर्तव्य निभा रहा है, परन्तु किसी भी मिडिया में उन्हें प्रकाशित नहीं किया जा रहा है।

संदेह तो था कि यह देश सामंतवाद की ओर लौट रहा है, आज प्रमाण मिल रहा है कि उससे भी पतित काल में हम जा रहे हैं। यदि यही हमारी गति रही तो वह दिन दूर नहीं जब हम पाषाणकाल की संस्कृति का गुणगान करते हुए, उस युग में जीएं। युवाओं की सोचने की क्षमता समाप्त है, एक ज़ोम्बी के समान युवाओं की भीड को कहीं भी मोडा या बहकाया जा रहा है।

दुर्भाग्य है कि हम मनुष्य को मनुष्य नहीं समझते और न ही सभी देशवासियों को भारत के नागरिक । आज भी वह हाथरस की बेटी एक दलित की बेटी है, वह क्या भारत की बेटी नहीं है? क्यों नहीं कहा जा रहा है कि वह भारत की बेटी है। जब तक हम ऐसी रेखा खींचेंगे, तबतक हम यह भी प्रमाणित करते रहेंगे कि हम इस पृथ्वी पर सबसे पतित समाज के संरक्षक हैं। अत्याचार और अपराध तो इन निर्बलों के साथ होता रहा है, इनके लिए न्याय की आशा केवल ईश्वरीय याचना है। कम से कम अंतिम संस्कार का अधिकार और सम्मान तो न छीना होता, कुछ तो मानवीयता के अवशेष बच जाते।

कोई राजनेता खुलकर नहीं बोल रहा, कोई अभिनेता विरोध नहीं कर रहा, विपक्ष को छुपाया जा रहा है, पत्रकार को और अधिवक्ता को भी पीडित परिवार से मिलने नहीं दिया जा रहा है। इतिहास को एक बार फिर पढ लिजिए, अंग्रेजी शासन में भी इतनी अराजकता नहीं थी।

सदियों बाद हम भारतीयो को स्वतंत्रता की चाह हुई और तन मन धन की आहूति देकर हमने इस स्वतंत्र भारत को पाया। हम कहाँ से कहाँ पहुंच गए। लोकतंत्र कहीं हो, और यह सब देख रहा हो, उसने निश्चय ही आत्महत्या कर ली होगी।

कितने नीचे हम गिर गए हैं, इसकी अनुभूति आज हमें नहीं होगी परन्तु भविष्य में अवश्य हमें रोना आएगा कि हमने लोकतंत्र को क्यों नहीं बचाया, क्यों हमने अपनी स्वतंत्रता नहीं बचाई..... पुनः विचार करो ... हमने क्या पाया, क्या खोया.... बचा लो इस देश 

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